पहले कैसी दिखता था स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी, जानें कैसे बदल गया इसका रंग?

आज न्यूयॉर्क के हार्बर में खड़ा स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी को देखकर हर किसी के मन में यही छवि आती है- हरा रंग, शांत चेहरा और आजादी का प्रतीक, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह प्रतिमा हमेशा ऐसी नहीं दिखती थी. कभी यह चमकती हुई तांबे जैसी थी, बिल्कुल नए सिक्के के रंग की थी. आखिर ऐसा क्या हुआ कि इसकी पहचान बन चुका रंग पूरी तरह बदल गया? इसके पीछे छिपी है विज्ञान, समय और इतिहास की दिलचस्प कहानी है.

स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी की शुरुआती झलक

जब स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी को 1886 में अमेरिका में स्थापित किया गया था, तब इसका रंग आज से बिल्कुल अलग था. यह प्रतिमा तांबे की पतली चादरों से बनाई गई थी, इसलिए इसका रंग लाल-भूरा और चमकदार था. उस समय इसे देखने वाले लोग बताते हैं कि यह धूप में चमकती हुई किसी नए तांबे के सिक्के जैसी लगती थी. फ्रांस से लाई गई इस प्रतिमा का यह रंग उस दौर में बेहद आकर्षक माना जाता था.

रंग बदलने की शुरुआत कैसे हुई?

समय के साथ जब यह प्रतिमा खुले वातावरण में खड़ी रही, तो हवा, नमी और मौसम का असर इस पर पड़ने लगा. तांबा जब हवा में मौजूद ऑक्सीजन, नमी और कार्बन डाइऑक्साइड के संपर्क में आता है, तो एक प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे ऑक्सीकरण कहा जाता है. इसी प्रक्रिया के कारण तांबे की सतह पर धीरे-धीरे हरे रंग की परत जमने लगी.

क्या है पेटिना और क्यों बनी?

इस हरे रंग की परत को पेटिना या वर्डिग्रिस कहा जाता है. यह कोई नुकसानदायक जंग नहीं होती है, बल्कि एक तरह की सुरक्षा परत होती है. पेटिना तांबे को आगे होने वाले गंभीर क्षरण से बचाती है. यानी जो हरा रंग आज हमें दिखता है, वही दरअसल इस प्रतिमा की ढाल है, जिसने इसे सौ साल से ज्यादा समय तक सुरक्षित रखा हुआ है.

कितने समय में पूरा रंग बदला?

स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी का रंग रातों-रात नहीं बदला. रिपोर्ट्स की मानें तो 1890 के दशक के अंत तक इसमें हरेपन के निशान दिखने लगे थे. करीब 1900 से 1902 के बीच इसका रंग साफ तौर पर बदलता नजर आया और 1906 तक पूरी प्रतिमा अपने मौजूदा तांबा-हरे रंग में बदल चुकी थी. यानी इसे पूरी तरह बदलने में लगभग 20 से 30 साल का समय लगा. 

क्या कभी रंग वापस बदलने की सोची गई?

जब प्रतिमा का रंग बदल रहा था, तब कई लोगों को यह पसंद नहीं आया. यहां तक कि कुछ सुझाव आए कि इसे साफ करके फिर से तांबे जैसा बना दिया जाए, लेकिन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने समझाया कि हरी परत हटाने से तांबा कमजोर हो सकता है. इसके बाद यह तय किया गया कि इसी रंग को रहने दिया जाए, जो बाद में स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी की सबसे बड़ी पहचान बन गया.

आज का रंग क्यों है खास?

आज जो हरा रंग हम देखते हैं, वही इसे दुनिया की सबसे पहचानी जाने वाली मूर्तियों में शामिल करता है. यह रंग न सिर्फ इसकी उम्र और मजबूती का प्रतीक है, बल्कि समय के साथ बदलते इतिहास की भी कहानी कहता है. यही वजह है कि अब कोई इसकी कल्पना भी पुराने तांबे रंग में नहीं करता.

यह भी पढ़ें: परमाणु बम बनाने से पीछे क्यों हटे थे आइंस्टीन, मैनहट्टन प्रोजेक्ट में क्यों नहीं हुए थे शामिल?

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